सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों का टोटा, 86 प्रतिशत पद खाली
401 स्वीकृत पदों पर सिर्फ 55 विशेषज्ञ डॉक्टर तैनात, फिजिशियन, एनेस्थेटिस्ट और सर्जन की भी भारी कमी; जिला व उप जिला अस्पतालों में भी सैकड़ों पद रिक्त
देहरादून (सुमित सैनी)। उत्तराखंड की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी का मामला सामने आया है। स्वास्थ्य विभाग की ओर से उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार प्रदेश के 80 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) में विशेषज्ञ डॉक्टरों के कुल 401 पद स्वीकृत हैं, लेकिन इनमें महज 55 डॉक्टर ही तैनात हैं। इस तरह 346 पद रिक्त पड़े हैं। आंकड़ों के अनुसार सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों के करीब 86 प्रतिशत पद खाली हैं।
विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी का असर सबसे अधिक महत्वपूर्ण चिकित्सा सेवाओं पर दिखाई दे रहा है। सीएचसी स्तर पर फिजिशियन के 81 स्वीकृत पदों में केवल 9 डॉक्टर कार्यरत हैं। इसी तरह एनेस्थेटिस्ट के 80 पदों में 9 डॉक्टर तथा सर्जन के 80 पदों में महज 11 डॉक्टर तैनात हैं। ऐसे में गंभीर मरीजों और ऑपरेशन की आवश्यकता वाले रोगियों को समय पर विशेषज्ञ उपचार मिलने में मुश्किलें सामने आ सकती हैं।
जिला और उप जिला अस्पतालों में भी हालात चिंताजनक
विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी केवल सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों तक सीमित नहीं है। प्रदेश के जिला अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों के 182 पद स्वीकृत हैं, जिनमें से 65 पद खाली पड़े हैं। वहीं उप जिला अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों के 257 स्वीकृत पदों में 134 पद रिक्त हैं। यदि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, जिला अस्पताल और उप जिला अस्पताल—तीनों स्तरों को मिलाकर देखा जाए तो विशेषज्ञ डॉक्टरों के कुल 840 पद स्वीकृत हैं। इनमें से केवल 295 डॉक्टर ही कार्यरत हैं, जबकि 545 पद खाली पड़े हैं। यानी राज्य के सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की बड़ी संख्या में कमी बनी हुई है।
विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी से बढ़ रहा रेफरल का दबाव
विशेषज्ञ डॉक्टरों के पद खाली होने का सीधा असर मरीजों को मिलने वाली स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ रहा है। गंभीर बीमारी, सर्जरी, एनेस्थीसिया और अन्य विशेषज्ञ उपचार की जरूरत वाले मरीजों को कई बार उच्च चिकित्सा केंद्रों की ओर रेफर करना पड़ता है। इससे जिला और बड़े अस्पतालों पर भी मरीजों का अतिरिक्त दबाव बढ़ रहा है।विशेषकर पर्वतीय और दूरस्थ क्षेत्रों में समस्या और गंभीर हो जाती है। वहां स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध नहीं होने पर मरीजों और उनके परिजनों को इलाज के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। कई मामलों में मरीजों को 100 से 200 किलोमीटर या उससे भी अधिक दूरी तय कर बड़े अस्पतालों तक पहुंचना पड़ता है।
“डॉक्टर ही नहीं तो अस्पताल किस काम का?”
इन आंकड़ों पर सवाल उठाते हुए संस्था के अध्यक्ष कृष्णकांत ने कहा कि विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी का सीधा असर आम मरीजों पर पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि सरकारी अस्पतालों में पर्याप्त विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध नहीं होने से गंभीर मरीजों को समय पर उपचार नहीं मिल पा रहा है।
कृष्णकांत ने कहा, “जब अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टर ही नहीं होंगे तो गंभीर मरीजों का इलाज कैसे होगा? डॉक्टर ही नहीं तो अस्पताल किस काम के?” उन्होंने कहा कि सरकार को केवल अस्पतालों की संख्या बढ़ाने पर ध्यान देने के बजाय वहां आवश्यक विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित करनी चाहिए। खासकर ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी दूर करना बेहद जरूरी है।
545 रिक्त पद जल्द भरने की मांग
कृष्णकांत ने सरकार से प्रदेश में खाली पड़े 545 विशेषज्ञ डॉक्टरों के पदों को जल्द से जल्द भरने की मांग की है। उन्होंने कहा कि इसके लिए सरकार को समयबद्ध कार्ययोजना तैयार करनी चाहिए और विशेषज्ञ डॉक्टरों की तत्काल भर्ती एवं तैनाती सुनिश्चित करनी चाहिए। उन्होंने ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों के अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की तैनाती को प्राथमिकता देने की मांग करते हुए कहा कि जब तक सरकारी अस्पतालों में पर्याप्त विशेषज्ञ चिकित्सक उपलब्ध नहीं होंगे, तब तक आम जनता को बेहतर और सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने का लक्ष्य पूरा करना मुश्किल रहेगा।
विशेषज्ञ डॉक्टरों के इन आंकड़ों ने उत्तराखंड की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि जब बड़ी संख्या में स्वीकृत पद वर्षों से खाली हैं, तो दूरदराज के क्षेत्रों में गंभीर मरीजों को विशेषज्ञ उपचार आखिर कैसे उपलब्ध कराया जाएगा।
